रायगढ़। श्री श्याम मंदिर परिसर में श्री श्याम सखा महिला मंडल द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत ज्ञान कथा महोत्सव का 25 अगस्त को परीक्षित मोक्ष के प्रसंग के साथ विधिवत विराम हुआ। कथा वाचक पंडित भारत भूषण शास्त्री ने जामवंत उद्धार, राधा-कृष्ण प्रेम प्रसंग, सुदामा चरित्र, तुलसी वर्षा और परीक्षित मोक्ष तक विभिन्न प्रसंगों का वर्णन किया। कथा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या मौजूद रही। आयोजन के दौरान कथा से जुड़े सहयोगियों, भजन गायकों और आयोजन में योगदान देने वाले लोगों का सम्मान भी किया गया।
श्रावण मास के दौरान श्री श्याम मंदिर परिसर में आयोजित इस धार्मिक आयोजन की शुरुआत कलश यात्रा से हुई थी। कई दिनों तक चली कथा में भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं और भागवत के प्रमुख प्रसंगों का वर्णन किया गया। मंगलवार को कथा के अंतिम चरण में पंडित भारत भूषण शास्त्री ने परीक्षित मोक्ष के प्रसंग तक कथा पहुंचाते हुए महोत्सव को विराम दिया।
राधा-कृष्ण प्रेम प्रसंग का वर्णन
कथा के दौरान पंडित भारत भूषण शास्त्री ने भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रेम से जुड़ा एक भावपूर्ण प्रसंग सुनाया। कथावाचन में बताया गया कि एक अवसर पर द्वारिका में महारानी रुक्मणी भगवान श्रीकृष्ण के लिए गर्म दूध लेकर आईं। कथानुसार, दूध पीते ही श्रीकृष्ण को हृदय के समीप जलन महसूस हुई और उनके मुख से अनायास राधे नाम निकला। इसके बाद रुक्मणी ने उनसे राधा के प्रति उनके प्रेम के बारे में जिज्ञासा व्यक्त की। कथा प्रसंग में श्रीकृष्ण ने रुक्मणी को मथुरा जाकर राधा रानी के संबंध में जानने की बात कही। इसके बाद रुक्मणी उद्धव के साथ मथुरा पहुंचीं। वहां महल के अलग-अलग द्वारों पर मौजूद सुंदर युवतियों को देखकर उन्होंने राधा रानी के बारे में पूछा।
कथावाचन के अनुसार प्रत्येक स्थान पर उन्हें यही उत्तर मिला कि वे राधा रानी नहीं, बल्कि उनकी सेविका हैं। यह सुनकर रुक्मणी की राधा रानी को देखने की उत्सुकता और बढ़ती गई।
कथा में बताया गया कि आठवें द्वार के भीतर पहुंचने पर रुक्मणी ने राधा रानी को चुनरी से अपना चेहरा ढके हुए देखा। राधा रानी ने भीतर से ही रुक्मणी का स्वागत किया।
रुक्मणी ने उनसे पूछा कि क्या वे ही राधा रानी हैं। उत्तर मिलने पर उन्होंने राधा रानी का मुख देखने की इच्छा व्यक्त की। कथा प्रसंग के अनुसार राधा रानी ने पहले अपना चेहरा दिखाने से मना किया, लेकिन बार-बार आग्रह करने पर रुक्मणी ने उनकी चुनरी हटा दी। इसके बाद उन्होंने देखा कि राधा रानी का चेहरा लाल था। कथा में राधा रानी ने इसका कारण बताते हुए कहा कि रुक्मणी द्वारा श्रीकृष्ण को दिया गया गर्म दूध उनके हृदय तक पहुंचा, क्योंकि वे श्रीकृष्ण के हृदय में निवास करती हैं।
इस प्रसंग के माध्यम से कथावाचक ने राधा और श्रीकृष्ण के प्रेम की गहराई और भक्ति भाव का वर्णन किया। रुक्मणी द्वारा उनके प्रेम को अतुलनीय बताते हुए प्रणाम करने का प्रसंग भी कथा में सुनाया गया। इसके बाद पंडित भारत भूषण शास्त्री ने सुदामा चरित्र का वर्णन किया। कथा के माध्यम से श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता, भक्ति और समर्पण का प्रसंग सुनाया गया।
कथावाचन में सुदामा के जीवन की कठिन परिस्थितियों और उनकी दरिद्रता का वर्णन किया गया। पत्नी के आग्रह पर सुदामा अपने मित्र श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका पहुंचे। द्वारपालों से सुदामा के आने की सूचना मिलने पर श्रीकृष्ण स्वयं उनसे मिलने के लिए उत्सुक होकर बाहर पहुंचे।
कथा प्रसंग के अनुसार श्रीकृष्ण ने अपने बाल सखा सुदामा का अत्यंत आदर के साथ स्वागत किया और उन्हें महल के भीतर ले जाकर सत्कार किया। सुदामा अपनी पत्नी की ओर से लाए गए तीन मु_ी चावल को संकोचवश छिपाने का प्रयास कर रहे थे।
श्रीकृष्ण ने प्रेमपूर्वक चावल लेकर उसे ग्रहण किया। कथा में बताया गया कि प्रत्येक मु_ी चावल के साथ सुदामा पर श्रीकृष्ण की कृपा का प्रसंग जुड़ा है। तीसरी मु_ी चावल खाने के दौरान रानी रुक्मणी द्वारा श्रीकृष्ण को रोकने का प्रसंग भी श्रद्धालुओं को सुनाया गया।
लौटने पर बदली सुदामा की दुनिया
कथा में आगे बताया गया कि सुदामा को श्रीकृष्ण से विदा लेते समय किसी धन या संपत्ति की अपेक्षा नहीं थी, लेकिन रास्ते में उनके मन में अपनी परिस्थितियों को लेकर विचार जरूर आए। जब वे अपने नगर लौटे तो अपनी कुटिया के स्थान पर महल देखकर आश्चर्यचकित रह गए। कथावाचन के अनुसार उनकी पत्नी ने उन्हें बताया कि उनके मित्र श्रीकृष्ण की कृपा से उनका जीवन बदल गया और उन्हें राजसी वैभव प्राप्त हुआ।
इस प्रसंग के माध्यम से पंडित भारत भूषण शास्त्री ने मित्रता, प्रेम, निस्वार्थ भाव और भगवान के प्रति विश्वास का संदेश दिया। कथा के दौरान श्रद्धालुओं ने सुदामा और श्रीकृष्ण की मित्रता के प्रसंग को भावपूर्ण वातावरण में सुना।
कथावाचन आगे बढऩे के साथ तुलसी वर्षा का प्रसंग हुआ। इसके बाद कथा परीक्षित मोक्ष के चरण तक पहुंची। कथानुसार सूत जी ने अपने गले से तुलसी की माला उतारकर राजा परीक्षित को पहनाई। तुलसी माला धारण करने के साथ परीक्षित के मोक्ष प्राप्त करने का प्रसंग सुनाया गया। इसी के साथ श्रीमद्भागवत ज्ञान कथा को अगली कथा के आयोजन तक विराम दिया गया।
कथा के अंतिम दिन मंदिर परिसर में धार्मिक वातावरण बना रहा। मंत्रोच्चार, भजन और भागवत कथा के विभिन्न प्रसंगों के बीच श्रद्धालुओं ने आयोजन में सहभागिता की।
कथा के विराम के अवसर पर श्री श्याम सखा महिला मंडल की अध्यक्ष श्रीमती संगीता शर्मा और उनकी टीम ने आयोजन से जुड़े विभिन्न लोगों का सम्मान किया।
कथा में सुनाए गए प्रसंगों को समाचार पत्रों और पोर्टल के माध्यम से आमजन तक पहुंचाने के लिए विमल चौधरी को मंच पर बुलाकर सम्मानित किया गया। इस दौरान उपस्थित लोगों ने करतल ध्वनि के साथ उनका उत्साहवर्धन किया। सम्मान की अगली कड़ी में श्री महावीर अग्रवाल का भी सम्मान किया गया। आयोजन के दौरान तन, मन और धन से सहयोग देने वाले श्री घनश्याम गोयल, श्री गोपाल अग्रवाल और कुसमूरा निवासी श्री मनोहर लाल अग्रवाल को भी सम्मानित किया गया।
पूरे धार्मिक आयोजन के दौरान भजनों की प्रस्तुति देने वाले श्री वंश अरोड़ा और उनके साथियों को भी महिला मंडल की ओर से सम्मानित किया गया। आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाने वाली महिला मंडल की सदस्यों का भी उत्साहवर्धन किया गया।
कथा के दौरान पंडित अजय शास्त्री महाराज और पंडित अनिल शास्त्री महाराज के मंत्रोच्चार से मंदिर परिसर का वातावरण भक्तिमय बना रहा। आयोजन समिति ने कथा वाचक पंडित भारत भूषण शास्त्री और उनकी टीम के प्रति भी आभार व्यक्त किया।
महिला मंडल की ओर से कथा आयोजन में सहयोग देने वाले श्रद्धालुओं, प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े लोगों के प्रति भी धन्यवाद व्यक्त किया गया। कथा के विराम के बाद 26 अगस्त को सुबह 11 बजे भंडारे का आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने भंडारे में प्रसाद ग्रहण किया।



