नारायणपुर। जिले के एकमात्र बादलखोल अभयारण्य की सुरक्षा व्यवस्था सवालों के घेरे में है। जंगल की रक्षा के लिए लगाए गए बैरियर अब सुरक्षा कवच नहीं, बल्कि महज दिखावे का इंतजाम बनकर रह गए हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि बेन्द और साहीडाँड़ के स्थायी बैरियर दिन-रात खुले रहते हैं, वाहनों की जांच नहीं होती और रात के समय कर्मचारी भी नदारद रहते हैं। ऐसे में अभयारण्य में कौन आया, कौन गया और कौन लकड़ी लेकर निकल गया, इसकी निगरानी नहीं के बराबर है।
स्थिति यह है कि जिन बैरियरों का उद्देश्य वन माफियाओं और तस्करों की कमर तोडऩा था, वहीं बैरियर अब उनके लिए ‘ग्रीन सिग्नल’ साबित हो रहे हैं। अभ्यारण्य के अंदर से आने जाने वाले वाहनों को बिना रोक-टोक आने-जाने की खुली छूट मिलने से सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
हैरानी की बात यह भी है कि करीब सात महीने पहले वन विभाग ने डूमरपानी, साजापानी, बच्छरांव, गायलूंगा, जोराजाम और बेने जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में नए बैरियर लगाने का प्रस्ताव तैयार कर उच्च कार्यालय भेजा था। उप निदेशक एलिफेंट रिजर्व सरगुजा स्वयं बेने गांव पहुंचकर उनके द्वारा स्थल निरीक्षण भी किया गया, रेंज कार्यलय को दिए गए निर्देश के वावजूद आज तक बेने में नए बैरियर जमीन पर नजर नहीं आए। प्रस्ताव अब भी फाइलों में धूल फांकता बताया जा रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मौजूदा बैरियरों पर 24 घंटे निगरानी और सख्त जांच व्यवस्था लागू कर दी जाए तथा प्रस्तावित नए बैरियर शीघ्र बना दिए जाएं, तो अभयारण्य में होने वाली अवैध गतिविधियों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है।
स्थायी बैरियर हैं, लेकिन जांच नहीं
सबसे हैरानी की बात यह है कि वन विभाग द्वारा बेन्द और साहीडाँड़ में पहले से स्थायी बैरियर लगाए गए हैं और वहां कर्मचारियों की नियुक्ति भी की गई है। लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि दोनों बैरियर दिन रात खुले रहते हैं। अभयारण्य की ओर से आने-जाने वाले वाहनों की जांच तक नहीं होती। रात के समय कोई कर्मचारी भी मौजूद नहीं रहता, जिससे तस्करों को अवैध लकड़ी निकालने में और अधिक आसानी हो जाती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है-जब जंगल की सुरक्षा के लिए बने बैरियर ही खुले छोड़ दिए जाएं तो आखिर बादलखोल अभयारण्य की रक्षा किसके भरोसे है?
एक साल पूर्व 12 विशाल साल वृक्ष काटे गए
बादलखोल अभयारण्य में अवैध कटाई का सबसे बड़ा मामला 14 अगस्त 2025 की रात सामने आया था। साहीडाँड़ सर्किल क्षेत्र में तस्करों ने एक साथ 12 से अधिक विशाल साल के पेड़ काट दिए थे। इन पेड़ों की कीमत लाखों रुपये आंकी गई है। हालांकि किसी कारणवश तस्कर लकड़ी ले नहीं जा सके। घटना की जानकारी विभाग को दो दिन बाद मिली, जिसके बाद लकड़ी जब्त कर डिपो पहुंचाई गई। बेरियर में लगातार सघन जांच होते रहता तो तस्करों का हौंसला बुलंद नही होता। लोगों के अनुसार बादलखोल अभयारण्य के इतिहास में यह पहली घटना थी जब इतनी बड़ी संख्या में साल के वृक्ष एक साथ काटे गए। इसके बावजूद न तो किसी बड़े अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई और न ही संबंधित रेंज, सर्किल या बीट स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई की गई। मामला धीरे-धीरे ठंडे बस्ते में चला गया।
मुखबिर तंत्र और रात्रि गश्त बढ़ाने की जरूरत
वन संरक्षण को लेकर जागरूक लोगों का कहना है कि केवल प्रस्ताव बनाकर भेज देने से जंगल नहीं बचेंगे। विभाग को नियमित रात्रि गश्त, संवेदनशील मार्गों पर स्थायी जांच चौकियां, मुखबिर तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है। साथ ही पकड़े जाने वालों पर कठोर कानूनी कार्रवाई हो ताकि जंगलों को नुकसान पहुंचाने वालों में कानून का भय पैदा हो। बादलखोल अभयारण्य जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में जब बैरियर लगाने का प्रस्ताव महीनों से लंबित है, मौजूदा बैरियर निष्क्रिय हैं तो आखिर वन संपदा की सुरक्षा की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? अब देखना होगा कि विभाग इस ओर गंभीर कदम उठाता है या फिर तस्करों को इसी तरह जंगलों को उजाडऩे का मौका मिलता रहेगा।
बेन्द ओर साहीडाँड़ में दो बेरियर है दोनों में एक-एक चौकीदार नियुक्त है 24 घंटा डियूटी करना सम्भव नही है। चार नए बेरियर का प्रस्ताव भेजा गया है स्वीकृति मिलते ही बेरियर लगाए जाएंगे।
आशुतोष भगत-अधीक्षक बादलखोल अभ्यारण्य -नारायणपुर
बादलखोल अभ्यारण्य की उपेक्षा के कारण आज यह अभ्यारण्य धरातल पर नहीं बल्कि कागजों में सिमट कर रह गया है यह न केवल जैव विविधता के संरक्षण का केंद्र है बल्कि जशपुर जिले का फेफड़ा भी था लेकिन विभागीय उपेक्षा के कारण जशपुर का यह फेफड़ा नष्ट होने के कगार पर है।
रामप्रकाश पाण्डे – अधिवक्ता एवं वन प्रेमी – जशपुर



