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सारंगढ़

प्रेस वार्ता : अपनी कुर्सी बचाने के लिए इंदिरा ने लगायी आपात काल

lochan Gupta
Last updated: June 24, 2026 11:45 pm
By lochan Gupta June 24, 2026
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10 Min Read

सारंगढ़। जिला भाजपा कार्यालय में लोकेश कावरिया प्रेसिडेंट छग दिव्यांगजन फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के द्वारा 25 जून 75 आपातकाल को लेकर प्रेस वार्ता आहूत कियें, जिस में लगभग 25 पत्रकार उपस्थित रहे। मंच पर अमित तिवारी, केराबाई मनहर, जिला मीडिया प्रभारी रवि तिवारी, सह मीडिया पर प्रभारी ओमकार केसरवानी वही मंच संचालन मनोज जायसवाल ने किया। लोकेश कांवरिया ने पत्रकारों के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहे कि – हम सब जानते हैं कि 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 महीने की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने तब के प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपात काल लगा दिया था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह अलोकतांत्रिक काल था। आपात काल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। लोकनायक जेपी नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काला दिन कहा।
श्रीमती इंदिरा गांधी की भ्रष्टाचार व अनियमितता के खिलाफ देश भर में तब भयंकर आक्रोश था। विगत चुनाव में इंदिरा गांधी के प्रतिद्वंदी रहे राजनारायण जी की चुनाव याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा श्रीमती इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला देने पर उनके हाथ से सत्ता निकलती दिखी और तब 25 जून, 1975 की रात को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधान मंत्री की सलाह पर उस मसौदे पर मुहर लगाते हुए देश में संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल घोषित कर दिया। लोकतंत्र को निलंबित कर दिया गया।
आपातकाल की घोषणा होते ही स्वयंसेवकों और तमाम गैर कांग्रेसी नेताओं की गिरफ्तारी शुरू हो गयी। उन पर प्रताडऩाओं का सिलसिला सा चल पड़ा। देश भर से लाखों लोग सत्यागढ़ करके जेल गए और लाखों लोगों को गिरफ्तार किया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, के, अरुण जेटली, मलकानी, आर जॉर्ज फर्नांडिस, नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रामविलास पासवान शरद यादव, रामबहादुर राय समेत हज़ारों लोग गिरफ्तार कर लिए गए थे। अविभाजित मध्यप्रदेश से भी सारे नेता गिरफ्तार कर लिए गए थे।
हम सब जानते हैं कि भारत में एक सदी भर लम्बे संघर्षों और हज़ारों हुतात्माओं के बलिदान के बाद हमने आज़ादी पायी थी। आज़ादी उपरांत संविधान सभा के अध्यक्ष डा राजेन्द्र व संविधान के प्रारूप समिति के भीमराव अम्बेडकर जिन्हें हम संविधान निर्माता के रूप में जानते हैं उसने ही लोकतंत्र हमें उपहार दिया।
बड़े ही त्याग और बलिदान से प्राप्त इस लोकतंत्र को कांग्रेस नेत्री तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आधी रात को ख़त्म कर देश को फिर से तानाशाही और गुलामी के उसी बियाबान में धकेल दिया थाजहां से. मे 1947 निकल कर भारत वापस आया था। दशकों से हमें ‘सेक्युलरिज्म और सोशलिज्म’ जैसे शब्दों से डराने की कोशिश की जाती है। जबकि तथ्य यह है कि ये दोनों शब्द आपातकाल से पहले हमारे संविधान का हिस्सा थे ही नहीं। आपातकाल में जब सारी ताकतें केवल एक व्यक्ति में केन्द्रित कर दी गयी थी, राष्ट्रपति, न्याय पालिका, संसद समेत सभी संवैधानिक निकाय निष्प्रभावी कर दिए गए थे, तब पंथ निरपेक्षता और समाजवाद इन दोनों शब्दों को संविधान के प्रस्तावना में चुपके से डाल दिए गए थे। यह खासकर याद रखना होगा की आपातकाल के दौरान अभिव्यक्ति की आज़ादी को भी बुरी कुचल दिया गया था। मीडिया पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाया गया था। इमरजेंसी लगाने के तुरंत बाद अख़बारों के दफ्तरों की बिजली काट दी गई, ताकि ज्यादातर अखबार अगले दिन आपात काल का समाचार ना छाप सकें। आपात काल के दौरान 3801 अख़बारों को ज़ब्त किया गया। 327 पत्रकारों को मीसा कानून के तहत जेल में बंद कर दिया गया। 290 अख़बारों में सरकारी विज्ञापन बंद कर दिए गए। ब्रिटेन के ञ्जद्धद्ग ञ्जद्बद्वद्गह्य और ञ्जद्धद्ग त्रह्वड्डह्म्स्रद्बड्डठ्ठ जैसे कई समाचार पत्रों के 7 संवाददाताओं को भारत से निकाल दिया गया। रॉयटर्स सहित कई विदेशी न्यूज़ एजेंसियों के टेलीफोन और दूसरी सुविधाएं काट दी गई। 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता छीन ली गई। 29 विदेशी पत्रकारों को भारत में एंट्री देने से मना कर दिया गया।
छग समेत जिन मु_ी भर प्रदेशों में कांग्रेस या उसके प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष समर्थित दलों का शासन है, वहां क्या हो रहा है, देख लीजिये। महाराष्ट्र में किस तरह से असहमति के कारण अभिनेत्री का घर ढाह दिया जाता है. पत्रकारों के साथ कैसा सलूक होता है। पालघर के साधुओं को भीड़ द्वारा लिंच कर देने की खबर दिखाने के कारण अर्णव गोस्वामी और उनकी टीम के साथ कांग्रेस समर्थित सरकार ने वहां कैसा बर्बर अत्याचार किया, यह उदाहरण सामने है, ये तमाम चीजें महज़ संयोग नहीं बल्कि प्रयोग है। यही आपात काल वाली कांग्रेस की मूल वृत्ति है। आप पश्चिम बंगाल का उदाहरण देख लीजिये। कांग्रेस कम्युनिस्टों के प्रत्यक्ष समर्थन से चुनकर आयी सरकार सत्ता में आते ही कार्यकर्ता द्वारा किस नृशंस तरीके से हत्या, बलात्कार और लूट आदि को अंजाम दे रही है। वास्तव में ऐसे तमाम उदाहरण आपात काल जैसी मनो वृत्ति के ही हैं।प्रदेश की अभी की कां सरकार का उदाहरण तो सबसे नया और अनूठा है जहां किसी द्वीट को रीद्वीट तक करना बड़ा अपराध बना दिया जाता है। जहां शासन के संसाधनों और समय का पूरा उपयोग भाजपा प्रवक्ता की आवाज़ को पुलिसिया दर दिखा कर दबाने, राष्ट्रीय पत्रकारों पर सौ-सौ मुकदमें दर्ज करने में लगा दिया जाता है। जहां कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा पुलिस स्टेशन के सामने ही पत्रकारों से बर्बरता से हिंसा तक की जाती है. महज़ इसलिए क्योंकि वह आपसे असहमत है और आप वैसे ही उनकी अभिव्यक्ति की आज़ादी को खत्म करना चाहते हैं जैसा इंदिरा जी ने किया था।
आपातकाल के सन्दर्भ में एक खास बात हमें बार-बार स्मरण रखने की है कि आज 2021 में हम जिस आजादी की हवा में सांस ले रहे हैं, यह आज़ादी हमने कांग्रेस से लड़ हासिल की है। फिरंगियों अंग्रेजों से गांधी-सुभाष के नेतृत्व में लड़ कर हमें जो आज़ादी मिली थी, वह 1975 में हमने खो दी थी। कांग्रेस ने वह आज़ादी हमसे छीन ली थी। यह दूसरी आज़ादी हमने कांग्रेस से लड़ कर पायी है, कांग्रेस ने अपनी आज़ादी की विरासत को, तब ही खत्म कर दिया था। भारतीय संविधान और लोकतंत्र आज के भाजपा (तब का भारतीय जनसंघ) के इतिहास पुरुष अटल-आडवाणी-नानाजी जैसे राष्ट्र वादियों का हासिल किया लोकतंत्र है। लोक नायक जयप्रकाश नारायण का कमाया लोकतंत्र है, यह जिसका आज हम आनंद ले रहे हैं। आज का लोक तंत्र कांग्रेस के कारण नहीं, बल्कि उसके बावजूद कायम है। बात चाहे इस आपात काल की हो या पहली आज़ादी के बाद देश के विभाजन की, या उसके बाद भी, कांग्रेस ने लगातार यह साबित किया है कि भारतीय लोकतंत्र के पवित्र शब्दों का, भारत के लोगों द्वारा आत्मार्पित भारत के संविधान की आत्मा का, देश की एकता और अखण्डता का कांग्रेस के लिए तब कोई महत्त्व नहीं रहता है जब उसकी सत्ता नहीं हो या जानेवाली हो। बांटों और राज करो की विभाजन कारी सिद्धांत हमेशा ही कांग्रेस, खासकर नेहरू परिवार का मूलमंत्र रहा है।
हमने अपने पुरखों के बलिदान से भले आज़ादी दुबारा हासिल करने में सफलता पायी हो, लेकिन इस आज़ादी पर खतरे हमेशा बने रहेंगे, जब तक कांग्रेस कायम है। आपात काल भले 1977 में खत्म हो गया लेकिन, आपात काल की मनोवृत्ति वाले तत्व और संगठन आज भी मौजूद हैं, हर क्षण प्रतिपल लोकतंत्र विरोधी तत्वों के खतरे के प्रति सावधान रहने की ज़रुरत है। अगर आप इतिहास को याद नहीं रखेंगे तो उसे बार-बार दुहराने पर विवश होंगे। आपातकाल का यह इतिहास हमें इसलिए भी बार-बार हर बार स्मरण रखना चाहिए ताकि ऐसा कलंकित इतिहास कभी अब फिर दुहराने का दुस्साहस कांग्रेस या उस मनोवृत्ति वाला कोई दल कभी अब करने में सफल नहीं हो पाए। सत्ता के मद में चूर होकर कांग्रेस या ऐसा कोई दल फिर से इस भयानक इतिहास को दुहराने का साहस नहीं कर पाये, इस लिए हमेशा सचेत रहने की ज़रुरत है।

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