सारंगढ़। सारंगढ़ में विकास की रफ्तार ऐसी चली कि जनता को पहली बार लगा- ‘अरे, जिला बनना सिर्फ नक्शे में रंग भरना नहीं होता, ज़मीन पर कुछ बनता भी है!’ नवीन जिला संयुक्त कार्यालय, एसडीएम कार्यालय, ट्रांजिट हॉस्टल का जीर्णोद्धारज् और वो भी एक ही परिसर में। यानी आम आदमी को अब सरकारी दफ्तर खोजने के लिए भूगोल की किताब नहीं पढऩी पड़ेगी। फाइल लेकर इधर-उधर भटकने की पुरानी सरकारी परंपरा पर मानो बुलडोजर चल गया हो। उधर नालंदा लाइब्रेरी, लाइवलीहुड कॉलेज और गर्ल्स कॉलेज को एक साथ विकसित करने का प्रस्ताव ऐसा था मानो सारंगढ़ में पहली बार किसी ने ‘एजुकेशन हब’ शब्द को सिर्फ भाषण से निकालकर नक्शे पर उतारा हो। टिमरलगा को पर्यटन क्षेत्र बनाने की मुख्यमंत्री घोषणा ने भी लोगों को यह भरोसा दिलाया कि शायद अब विकास सिर्फ पोस्टर में मुस्कुराता चेहरा नहीं, सडक़ और संरचना के रूप में भी दिखाई देगा। लेकिन सारंगढ़ की किस्मत भी बड़ी फिल्मी है। जैसे ही विकास की गाड़ी ने बुलेट ट्रेन वाली स्पीड पकड़ी, सरकार ने ड्राइवर ही बदल दिया। आईएएस संजय कन्नौजे के कार्यकाल में प्रशासन पहली बार ‘फाइल आगे बढ़ रही है’ वाली दुर्लभ प्रजाति में दिखा। तय समय सीमा, लगातार मॉनिटरिंग और काम की रफ्तार देखकर लोगों को लगने लगा था कि शायद सारंगढ़ अब ‘घोषणा जिला’ से आगे बढक़र ‘निर्माण जिला’ बनने जा रहा है , लेकिन अचानक हुए ट्रांसफर ने जनता को फिर वही पुराना सरकारी अनुभव याद दिला दिया—यहाँ कुर्सी का पहिया विकास के पहिये से ज्यादा तेज घूमता है। अब जिम्मेदारी नई कलेक्टर पद्मिनी भोई साहू के कंधों पर है। जनता उन्हें सिर्फ एक नए अधिकारी के रूप में नहीं, बल्कि अधूरी उम्मीदों की नई संरक्षक के रूप में देख रही है। चुनौती केवल निर्माण कार्य पूरे करने की नहीं है, बल्कि उस भरोसे को बचाने की भी है जो पिछले कुछ महीनों में बड़ी मुश्किल से पैदा हुआ था। सारंगढ़ की जनता अब तुलना भी करेगी और कसौटी भी तय करेगी। संजय कन्नौजे को लोग ‘रफ्तार वाले कलेक्टर’ के रूप में याद कर रहे हैं। अब देखना यह है कि पद्मिनी भोई साहू उस रफ्तार को बनाए रखती हैं या फिर सरकारी मशीनरी वापस उसी पारंपरिक चाल में लौटती है जहाँ एक पुलिया बनने में उतना समय लगता है जितने में बच्चे स्कूल से कॉलेज पहुँच जाएँ। सबसे दिलचस्प बात यह है कि सारंगढ़ में अब विकास योजनाओं से ज्यादा चर्चा ट्रांसफर राजनीति की हो रही है। लोग पूछ रहे हैं- अगर हर तेज काम करने वाले अफसर का यही हश्र होना है, तो फिर ‘सुशासन’ का मतलब क्या सिर्फ विज्ञापन बचा है? जनता जानती है कि कलेक्टर बदलने से नक्शे नहीं बदलते, लेकिन नीयत और निगरानी बदल जाए तो परियोजनाएँ वर्षों तक सीमेंट, सरिया और शिलान्यास पत्थरों में दबी रह जाती हैं। सारंगढ़ इस समय ठीक उसी मोड़ पर खड़ा है—जहाँ विकास की इमारत बन भी सकती है और फाइलों में दफन भी हो सकती है। अब नई कलेक्टर के सामने असली परीक्षा यही है कि वे सिस्टम को साधती हैंज् या सिस्टम उन्हें साध लेता है।



