रायपुर। राजधानी रायपुर में नो फ्लैक्स जोन अब सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है. तेलीबांधा से टाटीबंध तक की सडक़ को नो फ्लैक्स स्ट्रीट घोषित किया गया था, जो रंग-बिरंगे राजनीतिक और धार्मिक फ्लैक्स से पटी हुई है. इन फ्लैक्सों को हटाने में नगर निगम हर महीने 8 से 10 लाख रुपये खर्च कर रहा है, लेकिन हालात जस के तस हैं। आमापारा से यूनिवर्सिटी गेट तक लगे स्मार्ट पोल अब फ्लैक्स पोल बन चुके हैं. टूटे फ्रेम और लटकते फ्लैक्स दोपहिया वाहन चालकों के लिए खतरा बन रहे हैं. हाल के महीनों में ऐसे हादसे भी सामने आए हैं, जिनमें लोगों को चोटें आईं, लोगों की मौत भी हुई है. फ्लैक्स को हटाने निगम हर महीने 10 टाटा एस गाडिय़ां और प्रत्येक जोन में 5-5 कर्मचारियों की ड्यूटी लगाता है, लेकिन फ्लैक्स हटाने के बाद भी ये फिर से लग जाते हैं।
महापौर मीनल चौबे ने हाल ही में सख्ती के आदेश दिए, लेकिन निगम अफसरों का कहना है कि राजनीतिक दबाव के चलते कार्रवाई कमजोर पड़ जाती है। विधायक राजेश मूणत और कलेक्टर डॉ. गौरव कुमार सिंह ने भी फ्लैक्स पर रोक के लिए आदेश दिए थे, लेकिन राजनीतिक सिफारिशों के चलते निगम पीछे हट जाता है। नगर निवेश प्रभारी आभाष मिश्रा ने कहा, महापौर और आयुक्त इस बार सख्त हैं। बड़े शहरों की तर्ज पर रायपुर में भी रोडसाइड फ्लैक्स पर पूरी तरह रोक लगेगी। श्रीगणेश विसर्जन को दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन आमापारा चौक पर अब भी गणेश उत्सव के फ्लैक्स टंगे हैं. नवरात्रि और दशहरा के फ्लैक्स भी दीपावली तक बने रहते हैं. निगम कर्मचारियों का कहना है कि ऊपर से फोन आने पर कार्रवाई रुक जाती है।
फ्लैक्स हटाने से निकलने वाला प्लास्टिक कचरा पर्यावरण के लिए नई चुनौती बन रहा है। यह न तो आसानी से रिसाइकल हो सकता है और न ही जलाया जा सकता है, क्योंकि जलाने से जहरीला धुआं निकलता है। निगम के पास अभी ठोस कचरा निपटान की व्यवस्था नहीं है। इसे रिसाइकल के लिए एजेंसियों को सौंपा जा रहा है। हर महीने 8-10 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद शहर की सूरत नहीं सुधर रही। इस राशि से साफ-सफाई या सडक़ सुधार में निवेश हो सकता था। निगम अब अगले महीने से सख्ती और जागरूकता अभियान शुरू करने की योजना बना रही है। अफसरों का दावा है कि अगर राजनीतिक फ्लैक्स पर भी निष्पक्ष कार्रवाई हुई तो रायपुर को फ्लैक्स-मुक्त बनाया जा सकता है। फिलहाल, रायपुर की सडक़ें यह सच्चाई बयां करती है कि जहां ‘नो फ्लैक्स’ लिखा है, वहां सबसे ज्यादा फ्लैक्स लटके हैं।
हर महीने 8-10 लाख खर्च, फिर भी सडक़ों पर फ्लैक्स की भरमार
‘नो फ्लैक्स जोन’ बना मजाक, राजनीतिक दबाव में अटकी कार्रवाई



