रायगढ़। करीब तीन वर्ष पहले तमनार थाना क्षेत्र के ग्राम गोढ़ी में हुए बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में विशेष न्यायालय (अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम), रायगढ़ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए चार आरोपियों को दोषी ठहराकर दो-दो बार आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। मजबूत पुलिस विवेचना और प्रभावी अभियोजन के आधार पर न्यायालय ने आरोपियों को हत्या, आपराधिक षड्यंत्र, साक्ष्य मिटाने के प्रयास तथा एससी-एसटी एक्ट के तहत दोषसिद्ध माना। विशेष न्यायाधीश श्रीमती शोभना कोष्ठा ने थाना तमनार के अपराध क्रमांक 268/2023 में 31 जुलाई 2026 को यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया।
अभियोजन के अनुसार, 19 जुलाई 2023 की रात लगभग 10.30 बजे ग्राम गोढ़ी में पुरानी रंजिश के चलते आरोपियों ने पूर्व नियोजित षड्यंत्र के तहत अनुसूचित जनजाति वर्ग के राघुवन चौहान और उद्धव चौहान पर टांगी, डंडे एवं अन्य घातक हथियारों से हमला कर उनकी निर्मम हत्या कर दी। वारदात के बाद आरोपियों ने अपराध को दुर्घटना का रूप देने की नीयत से एक मृतक के शव को मुख्य सडक़ तक घसीटकर साक्ष्य मिटाने का प्रयास भी किया।
घटना की सूचना मिलते ही थाना तमनार पुलिस ने तत्काल अपराध दर्ज कर विवेचना शुरू की। प्रारंभिक जांच तत्कालीन थाना प्रभारी निरीक्षक आशीर्वाद रहटगांवकर ने की। घटनास्थल का सूक्ष्म निरीक्षण, वैज्ञानिक साक्ष्य संकलन, आरोपियों से पूछताछ, मेमोरेण्डम के आधार पर हत्या में प्रयुक्त हथियारों की बरामदगी तथा गवाहों के बयान दर्ज किए गए। इसके बाद अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार प्रकरण की अग्रिम विवेचना तत्कालीन उप पुलिस अधीक्षक दीपक मिश्रा ने की। उनके सुपरवीजन में महत्वपूर्ण प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान धारा 164 के तहत दर्ज कराए गए, फरार आरोपियों के विरुद्ध आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की गई, जाति संबंधी साक्ष्य संकलित किए गए तथा सभी तथ्यों को समाहित करते हुए मजबूत अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।
प्रभावी पैरवी से मिली दोषसिद्धि
प्रकरण में राज्य शासन की ओर से विशेष लोक अभियोजक राजीव बेरीवाल ने प्रभावी और सशक्त पैरवी की। अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों एवं गवाहों को न्यायालय ने विश्वसनीय माना और चारों आरोपियों को दोषी करार दिया। न्यायालय ने हरिलाल उरांव, मुकेश पडिहारी, जितेंद्र पटनायक उर्फ जीतू तथा गणेश पडिहारी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/120-बी, 201/120-बी तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(1) के तहत दोषसिद्ध करते हुए दो-दो बार आजीवन कारावास एवं अर्थदंड की सजा सुनाई। इस ऐतिहासिक निर्णय ने न केवल दोहरे हत्याकांड के पीडि़त परिवार को न्याय दिलाया, बल्कि यह भी साबित किया कि वैज्ञानिक विवेचना, सशक्त अनुसंधान और प्रभावी न्यायिक पैरवी के समन्वय से जघन्य अपराधों में दोषियों को कठोरतम सजा दिलाई जा सकती है।



