मीनकेतन प्रधान के संयोजन में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं काव्य-पाठ संपन्न
प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. श्रीराम परिहार का हुआ उत्कृष्ट व्याख्यान
नार्वे के प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल की अध्यक्षता में काव्य पाठ
रायगढ़। विश्व हिन्दी अधिष्ठान (न्यास), रायगढ़ (छत्तीसगढ़), भारत तथा देवम् फाउंडेशन कला एवं संस्कृति संस्थान, बुल्गारिया (यूरोप) के संयुक्त तत्वावधान में भारतीय ज्ञान परंपरा पर केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी एवं काव्य-पाठ का आयोजन गत 29 मई को सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में विद्वान द्वय प्रो. डॉ. विनय कुमार चौहान, कुलपति, शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ (छ.ग.), तथा डॉ. विनय कुमार पाठक, कुलपति, थावे विद्यापीठ, गोपालगंज (बिहार), पूर्व अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के मुख्य आतिथ्य में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात साहित्यकार डॉ. श्रीराम परिहार (खंडवा, म.प्र.) तथा काव्य-पाठ सत्र के अध्यक्ष प्रवासी साहित्यकार डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल (नॉर्वे) रहे।
विश्व हिन्दी अधिष्ठान के कार्यालय, रायगढ़ में सायं 6:00 बजे हाइब्रिड मोड में आरम्भ हुए इस कार्यक्रम की शुरुआत स्थल पर उपस्थित कुलपति डॉ. विनय कुमार चौहान, डॉ. विनय कुमार पाठक, संस्थान के संस्थापक मीनकेतन प्रधान, डॉ. बेठियार सिंह साहू, न्यासी डॉ. विद्या प्रधान, पंकज रथ शर्मा, रमेश श्रीवास्तव, रीना झा, अमित सदावर्ती, जानकी साहू, सोनल श्रीवास सहित अन्य विशिष्ट अतिथियों द्वारा माँ सरस्वती के छायाचित्र के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ हुई। इस अवसर पर प्रतिष्ठित कवयित्री वंदना कुँवर रायज़ादा (गाजियाबाद) ने ऑनलाइन सरस्वती वंदना का सस्वर पाठ किया। तत्पश्चात मुख्य अतिथियों का शॉल, श्रीफल, पुष्पगुच्छ एवं प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मान एवं अभिनंदन किया गया।
अगले क्रम में आयोजक मंडल की ओर से डॉ. मौना कौशिक (बुल्गारिया) ने समस्त अतिथियों तथा ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से जुड़े सभी साहित्यप्रेमियों का स्वागत करते हुए अपने उद्गार व्यक्त किए। सर्वप्रथम कुलपति डॉ. विनय कुमार चौहान का व्याख्यान हुआ, जिसमें उन्होंने इस आयोजन की वैश्विक हित, भाषा, संस्कृति एवं ज्ञान की समृद्धि की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका की सराहना की। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ की संवेदना पर प्रकाश डालते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के संदर्भ में प्रधानमंत्री एवं भारत सरकार की पहलों तथा नई शिक्षा नीति एवं पाठ्यक्रम में इसके समावेशन पर महत्त्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। साथ ही उन्होंने ‘भारतीय शोध-बोध’ नामक अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्रिका प्रकाशित करने की योजना पर भी चर्चा की।
अगली कड़ी में कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. श्रीराम परिहार ने भारतीय ज्ञान परंपरा को भारतीय जीवन-दृष्टि एवं जीवन-विधि के रूप में व्याख्यायित करते हुए अत्यंत विस्तृत एवं समृद्ध व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने ‘भारतीयता’, ‘परंपरा’ आदि शब्दों की अर्थवत्ता का गहन विश्लेषण करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का आदि स्रोत किसी को ज्ञात नहीं है और यह कहाँ तक विकसित होगी, इसका भी कोई निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता। यह चिर पुरातन होने के साथ-साथ नित-नूतन भी है; यही इसकी सनातनता का प्रमाण है।
भारतीय जीवन-दृष्टि के केंद्र में स्थित सत्य, दया, तप और ज्ञान जैसे मूल्यों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने वेदों के महावाक्यों—‘तत्त्वमसि’, ‘अहं ब्रह्मास्मि’, ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ एवं ‘अयमात्मा ब्रह्म’—की व्याख्या की तथा संपूर्ण भारतीय चिंतन को ज्ञान एवं कर्म के समन्वय के रूप में प्रस्तुत किया। इसके लिए उन्होंने ‘ऋषि’ एवं ‘कृषि’ का उदाहरण अत्यंत सटीक ढंग से रखा।

इसके पश्चात् थावे विद्यापीठ गोपालगंज ( बिहार ) के कुलपति डॉ. विनय कुमार पाठक का अत्यंत सरस एवं सारगर्भित व्याख्यान हुआ। उन्होंने भाषावैज्ञानिक दृष्टि से भारतीय शब्दों के आदि स्रोतों पर प्रकाश डालते हुए अंग्रेजी भाषा में उनके रूपांतरण की स्थिति को अनेक उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट किया। उन्होंने भारतीय ज्ञान-व्यवस्था को विश्व के लिए अत्यंत उपयोगी एवं चिरंतन मूल्य के रूप में रेखांकित करते हुए कहा कि यह भाषा, ज्ञान, संस्कृति एवं जीवन-दृष्टि पर केंद्रित एक महान चिंतन-परंपरा है, जिसका सम्यक् संवहन एवं अवबोध नई पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक है।
इसी क्रम में केन्द्रीय विश्वविद्यालय मिज़ोरम के वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. सुशील कुमार शर्मा ने भारतीय ज्ञान परंपरा के प्राचीन स्वरूप से ले कर आधुनिक समय में पूर्वोत्तर भारत की परम्पराओं पर सारगर्भित रूप से प्रकाश डाला। इसके अनंतर भारत विद्या विभाग ,सोफिया विश्वविद्यालय बुल्गारिया से प्रो. जय कौशल ने भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यावहारिक स्वरूप को स्पष्ट करते हुए लोक संस्कृति को उजागर किया। संगोष्ठी की विषयवस्तु को आगे बढ़ाते हुए अमेरिका – जलंधर से डॉ. वीणा विज उदित ने भारतीय ज्ञान परंपरा को हिन्दी साहित्य की मूल चेतना के रूप में स्थापित किया। विमर्श की महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में डॉ. मृदुल कीर्ति (अमेरिका ) ने भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल उत्स वैदिक महानतम ग्रंथों के अक्षय ज्ञानकोश को वैश्विक स्तर पर अद्वितीय बताते हुए आधुनिक युग समय में परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों के संवर्धन पर बल दिया। छत्तीसगढ़ के चर्चित साहित्यकार डॉ. रमेशचन्द्र श्रीवास्तव ने सांस्कृतिक जीवन मूल्यों को आज के वैज्ञानिक तकनीकी समय में एक सामंजस्य के साथ सामाजिक जीवन में व्यवहृत करने आवश्यकता पर अपने सार्थक विचार व्यक्त किया । आयोजन की एक बहुत महत्वपूर्ण बात यह रही कि विमर्श के इस क्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा को नक्षत्र विज्ञान से जोडक़र रीना झा ने अपने सार्थक विचार प्रस्तुत किया। प्रथम सत्र की संगोष्ठी के संबंध में शोधपरक सार्थक टिप्पणी शोधार्थी जानकी साव और सोनम मावतवाल ने की ।
डॉ. बेठियार सिंह साहू द्वारा समीक्षा-वक्तव्य प्रस्तुत किया गया। उन्होंने ऑफलाइन एवं ऑनलाइन माध्यम से जुड़े सभी विद्वानों को संबोधित करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापक संरचना को वेद, उपनिषद, दर्शन, भूगोल, खगोल, ज्योतिष, चिकित्सा विज्ञान, धातु विज्ञान आदि के विस्तृत परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया तथा पूर्ववर्ती वक्ताओं के विचारों का सार एवं विश्लेषण प्रस्तुत किया। इस अवसर पर नार्वे से डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल ने भारतीय ज्ञान परंपरा के महानतम आदर्शों को मानव जीवन के लिए आज के समय में अत्यंत आवश्यक बताया।
इन सभी विचारों और अभिमतों का समाहार करते हुए डॉ. सीमा रानी प्रधान ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इसी की निरंतरता में द्वितीय सत्र की शुरुआत करते हुए विश्व हिन्दी अधिष्ठान के संयोजक ,कार्यक्रम के सूत्रधार डॉ. मीनकेतन प्रधान ने द्वितीय सत्र के काव्य पाठ की अध्यक्षता के लिए
नार्वे के वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार
डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ल का विस्तृत साहित्यिक परिचय देते हुए आमंत्रित किया। इस अन्तर्राष्ट्रीय काव्य पाठ में भारत सहित कई देशों से जुड़े साहित्यिकों को प्रेरित करते हुए डॉ. शुक्ल ने साहित्य सृजन के माध्यम से जीवन मूल्यों के संरक्षण का आह्वान किया । अपनी कविताओं का पाठ कर उन्होंने आज के समय में साहित्य की महती भूमिका को स्थापित किया। इस सत्र का आत्म स्वागत उद्बोधन नीदरलैंड के प्रवासी साहित्यकार मनीष पांडेय ने दिया।देर रात तक चले इस काव्य पाठ कार्यक्रम डॉ. स्नेह ठाकुर ( कैनेडा), डॉ . शैलजा सक्सेना( कैनेडा) ,डॉ. कादम्बरी आदेश( अमेरिका) ,डॉ. करुणा पांडे( लखनऊ), अश्विनी केगांवकर ( नीदरलैंड), डॉ. ज्ञानेश्वरी सिंह( पुणे),मनीष पांडेय(नीदरलैंड),अंजनी कुमार तिवारी सुधाकर ,दिनेश कुमार माली जितेन्द्र सिंह(टेक्निकल यूनिवर्सिटी, सोफिया , बल्गारिया ), डॉ. मौना कौशिक (बुल्गारिया) की सक्रिय सहभागिता रही।
यह सत्र अत्यंत सदाशय, सुरुचिपूर्ण एवं साहित्यिक ऊष्मा से परिपूर्ण रहा, जिसका संचालन भारतीय समयानुसार रात्रि 12:00 बजे तक होता रहा। इस दौरान सभी साहित्य-प्रेमी उत्साहपूर्वक एक-दूसरे के विचार सुनते रहे तथा अपने विचारों एवं रचनाओं का प्रस्तुतीकरण करते रहे। कार्यक्रम का अत्यंत प्रभावशाली एवं रुचिकर संचालन डॉ. मीनकेतन प्रधान ने अपनी सम्मोहक एवं ओजस्वी भाषा-शैली में किया। सहभागियों के विशेष आग्रह पर उन्होंने अपनी दो नवीन रचित कविताओं का भी पाठ किया।
कार्यक्रम के अंतिम चरण में विश्व हिन्दी अधिष्ठान की न्यासी डॉ. विद्या प्रधान ने समस्त सहभागियों के प्रति सम्मान एवं अभिनंदन के भाव व्यक्त किए। अंत में दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. सौरभ सराफ ने कार्यक्रम की सार्थकता एवं वैश्विक महत्ता पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए मुख्य अतिथियों की उपस्थिति एवं वक्तव्यों को रेखांकित किया तथा ऑफलाइन एवं ऑनलाइन माध्यम से जुड़े सभी साहित्यप्रेमियों के प्रति आयोजन मंडल की ओर से धन्यवाद, आभार एवं कृतज्ञता ज्ञापित की।
संपूर्ण कार्यक्रम सौहार्दपूर्ण, ज्ञानवर्धक एवं गरिमामय वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के दौरान तकनीकी सहयोग एवं आवश्यक व्यवस्थाओं की दृष्टि से सर्व श्री पंकज रथ शर्मा, अमित सदावर्ती, गोलू, अक्षय गुप्ता, किरोड़ीमल शासकीय कला एवं महाविज्ञान महाविद्यालय के वरिष्ठ कर्मचारी डी. एस. चंद्रा, जांगड़े जी इत्यादि की अत्यंत सराहनीय भूमिका रही। साथ ही कार्यक्रम के सफल संचालन में प्रत्यक्ष परोक्ष से अनेक लोगों की उल्लेखनीय भूमिका रही। आयोजन की सफलता के लिए लिंगम चिरंजीव राव, प्रो. आर . के. पटेल, मनहरण सिंह ठाकुर , शीतल पाटनवार ,राहुल पंडा, हरिशंकर गौराहा, लल्लू प्रधान, आकाश सिंह, डॉ. एस . पी. गुप्ता, प्रमोद झा, सुमित दुबे, हरिशंकर गौराहा, लोचन गुप्ता, मनहरण सिंह ठाकुर आदि साहित्यकारों ने बधाई दी है । उक्त जानकारी विश्व हिन्दी अधिष्ठान के संस्थापक-संचालक विद्वान साहित्यकार डॉ. मीनकेतन प्रधान द्वारा प्रेस-विज्ञप्ति के माध्यम से प्रेषित की गई।



