रायगढ़। सरिया, बरमकेला और चंद्रपुर के बीच फैला डोलोमाइट का क्लस्टर अब सिर्फ खनन क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे एक बीमार भूगोल में बदलता जा रहा है। वर्षों से चल रहे खदान और क्रशर कारोबार ने इलाके की हवा, पानी और जमीन को इस कदर प्रभावित किया है कि यहां रहने वाले लोगों की जिंदगी धूल के साथ घुलती नजर आ रही है। इसके बावजूद शासन और प्रशासन की प्राथमिकता साफ दिख रही है, राजस्व बढ़ाना, चाहे इसके लिए लोगों की सेहत ही क्यों न गिरवी रखनी पड़े।
आने वाले 6 और 7 अप्रैल को कटंगपाली और साल्हेओना क्षेत्र में पांच फर्मों द्वारा डोलोमाइट उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए जनसुनवाई आयोजित की जा रही है। कागजों में इसे जनभागीदारी और पारदर्शिता का उत्सव बताया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह प्रक्रिया अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है। इन प्रस्तावों के लागू होने के बाद क्षेत्र से हर साल लगभग 5 लाख टन अतिरिक्त डोलोमाइट निकाला जाएगा, जिससे सरकारी खजाना तो जरूर भरेगा, लेकिन स्थानीय लोगों के फेफड़े और ज्यादा खाली होते जाएंगे।
सबसे गंभीर पहलू यह है कि इतने वर्षों के खनन और क्रशर संचालन के बावजूद यहां काम करने वाले मजदूरों और आसपास के निवासियों के लिए किसी प्रकार की नियमित स्वास्थ्य जांच की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। डोलोमाइट डस्ट से होने वाली सांस और फेफड़ों की बीमारियां धीरे-धीरे लोगों को जकड़ रही हैं, लेकिन न तो इन बीमारियों का कोई आधिकारिक आंकड़ा है और न ही इनसे निपटने की कोई ठोस योजना।
7 अप्रैल 2026 को आर्यन मिनरल्स एंड मेटल्स प्रालि की जनसुनवाई प्रस्तावित है, जिसमें क्रशर की उत्पादन क्षमता को एक लाख टन प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 2,00,198 टन करने का दावा किया गया है। कंपनी को वर्ष 2017 में लीज स्वीकृत की गई थी और जोतपुर, दुलमपुर तथा मौहापाली में लगभग 4.961 हेक्टेयर भूमि पर इसका संचालन हो रहा है। लीज की अवधि 24 जुलाई 2067 तक निर्धारित है, यानी आने वाले चार दशकों तक इस क्षेत्र में धूल और प्रदूषण का यह सिलसिला जारी रहने की पूरी तैयारी है।
प्रशासनिक उत्साह का आलम यह है कि संभावित राजस्व को लेकर योजनाएं बनाई जा रही हैं, लेकिन इस विकास की कीमत कौन चुका रहा है, इस सवाल पर खामोशी पसरी हुई है। जनसुनवाई में अक्सर वही आवाजें सुनी जाती हैं जो पहले से तय होती हैं, जबकि असली प्रभावित लोग या तो अनजान रहते हैं या उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
राजस्व बनाम स्वास्थ्य
सरकार के लिए डोलोमाइट उत्पादन बढ़ाना आर्थिक दृष्टि से फायदेमंद सौदा है। लाखों टन अतिरिक्त उत्पादन का मतलब करोड़ों रुपये का राजस्व, लेकिन इस गणित में स्थानीय लोगों की सेहत कहीं फिट नहीं बैठती। न तो स्वास्थ्य सर्वे हुआ, न ही प्रदूषण के असर का कोई गंभीर अध्ययन, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राजस्व के लिए लोगों की जिंदगी सस्ती हो गई है।
जनसुनवाई या औपचारिकता
जनसुनवाई का उद्देश्य आम जनता की राय लेना होता है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह प्रक्रिया अक्सर औपचारिकता बनकर रह जाती है। प्रभावित गांवों में पर्याप्त सूचना का अभाव, तकनीकी दस्तावेजों की जटिलता और प्रशासनिक दबाव के चलते वास्तविक विरोध सामने नहीं आ पाता। नतीजा यह होता है कि परियोजनाएं पास हो जाती हैं और जनता सिर्फ धूल निगलने को मजबूर रह जाती है।
डोलोमाइट का धंधा तेज, लोगों की सांसें धीमी
जनसुनवाई के नाम पर खानापूर्ति, राजस्व की भूख में बीमारियों पर पर्दा



