भटगांव/योगेश केशरवानी। नगर भटगांव से महज 3 किलो मीटर की दूरी पर स्थित ग्राम देवसागर में चैत्र पूर्णिमा के दिन विशेष रूप में पुजा अर्चना किया जाता है?। इस दिन मां हिंगलाज भवानी से सच्ची श्रद्धा और भक्ति से मांगी हुईं मनोकामना पूर्ण होती हैं इस दिन नगर तथा आसपास के क्षेत्रों से लाखों की संख्या में लोग माता के दर्शन करने आते हैं साथ ही इसी दिन मां भगवती हिंगलाज माता के मंदिर मे मेले का भव्य आयोजन किया जाता है। मेले में सुबह 5 बजे से रात्रि 8:30 बजे तक लोगों की भीड़ बनी रहती है, जहां मेले में लोग पूजा अर्चना कर मन्नतें मांगते हैं।
हल्दी की छिंटा का महत्व
वहीं बाहर से आये श्रध्दालु नारियल, नींबू चढ़ाकर अपनी मनोकामना के लिए वरदान मांगते हैं। जहां माता हिंगलाज मंदिर में प्रसाद के रूप में पुजारी द्वारा माता में चढ़ी हल्दी श्रध्दालुओं को दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि श्रध्दालू माता के दरबार में मन्नतें मांगते हैं और उनकी मनोकामना पूरी होती है। बताया जाता है कि चैत पूर्णिमा को इस क्षेत्र के धरनीहीन जो जमीन पर लेट कर जमीन नापते हुए मां हिंगलाज की मंदिर जाते हैं, और पूर्व रात्रि में मंदिर पहुंच कर लेटे रहते हैं। उन्हे सुबह पांच बजे जमींदार परिवार द्वारा पूजा अर्चना के बाद हल्दी पानी का छींटा देकर उठाया जाता है। उसके बाद धरनीहीन उठकर देवी की पूजा अर्चना कर मेले का आनंद लेते हैं, खास बात यह है कि जिस मां की गोद सुनी रहती है, एवं अन्य परेशानियों में जो शरीरिक रूप से परेशान रहते हैं, ऐसे लोग मां का दरबार में जमीन नापते ( लोट मारते) आते हैं और मन्नत मांगते है। जिसकी मन्नत पूरी होती होती है वे दूसरे साल चैत्र पूर्णिमा के दिन अपने बच्चों परिवार के साथ आते हैं और मां हिंगलाज का दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं।
पहाड़ो व वनांचल की सुन्दरता का लुत्फ उठाते हैं लोग
वहीं मां हिंगलाज मंदिर के आसपास अनेकों देवी-देवता की मुर्तियां मंदिर कि निर्माण किया गया जिसमें भैरव नाथ,बजरंग बली, राधा कृष्णा, महादेव, नंनदी, और समाजिक बन्धुओं द्वारा भी अनेक मंदिर बनवाया गया है शाम होते होते पहाड़ो की रौनकता बढऩे लगता और लोग इन पहाड़ों में मंदिर की घुम-घुम कर दर्शन पुजन कर पहाड़ो व वनांचल की सुन्दरता का लुत्फ उठाते हैं
भटगांव से महज 3 किलो मीटर की दूरी पर स्थित है मंदिर
आपको बता दें कि नगर भटगांव से महज 3 किलो मीटर में दक्षिण दिशा? की ओर ऐतिहासिक मंदिर पठारो में घिरा हुआ है। जहां आदि शक्ति मां हिंगलाज जेवरादाई विराजमान हैं, यह प्राचीन काल से चैत्र पूर्णिमा हनुमान जयंती के दिन एक दिवसीय भव्य मेला लगता है। मान्यता यह है कि लोगों की हर मन्नत पूरी होती है। लाखों की संख्या मे लोग दर्शन करने आते हैं। वहीं रात में एक भी व्यक्ति मंदिर के पास नहीं रूकता है, बताया जाता है कि माता जो है उस रात पूरे मंदिर क्षेत्र में भ्रमण करती है।
जमींदार परिवार के लोग करते हैं पूजा
जहां जमींदार परिवार द्वारा देवी की कई पीढिय़ों से पूजा अर्चना करते आ रहे है?। अंतिम जमींदार प्रेम भुवन प्रताप सिंह थे, उनकी वंशज प्रभादेवी, इंदिरा कुमारी द्वारा लगभग 50 वर्षों तक देवी की पूजा अर्चना की गई, और माता हिंगलाज भटगांव जमींदार की कुलदेवी के रूप में मानी जाती है?। प्रभादेवी के स्वर्गवास हो जाने के बाद उनकी छोटी बहन इंदिरा कुमारी ने पूजा अर्चना जारी रखी। इसके बाद उनके गोद पुत्र पुष्पेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा पूजा अर्चना अभी तक किया जा रहा है। क्षेत्र में यह बात देवसागर मंदिर के बारे में चर्चित है कि आज भी मेला के दिन रात्रि में 9 बजे के बाद कोई भी आदमी मेला परिसर में नहीं ठहराता?। कहा जाता है कि देवी का वाहन शेर आता है और बलि दिए हुए बकरे का खून चाट कर पूरा साफ कर देता है।
राजघराने से जुड़ी है कथा
इस ऐतिहासिक मंदिर का रहस्य भटगांव जमींदार व सारंगढ़ के राजघराने से जुड़ी हुई है। वहीं पुराने जमाने के बुजुर्गो द्वारा बताया गया कि प्राचीन काल से देवी हिंगलाज माता भटगांव नगर पंचायत से 3 किलों मीटर दूर ग्राम जेवराडीह गांव की पहाड़ी पर विराजमान थी। वहीं एक दिन सारंगढ़ के राजा को जेवरादाई की करूण गाथा का पता चला तब सारंगढ़ के राजा अपनी प्रजा के साथ जेवराडीह पहुंचे और देवी कहा कि मां आप मेरे साथ मेरे राज्य सारंगढ़ चलो तब माता जेवरादाई ने सारंगढ़ के राजा को कहा कि मैं तुम्हारे साथ चली जाऊंगी लेकिन इसमें मेरी एक सर्त है कि हे राजा तुम मेरे पग पग पे नींबू, नारियल तथा बकरे की बली चढ़ाओगे तभी मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे राज्य सारंगढ़ जाऊंगी और तुम रात भर में अगर सारंगढ़ ले जा पाओगे तभी मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे राज्य जाओगी और अगर मुझे ले जाते हुए सुबह हो गई तो मैं उसी जगह पर विराजमान हो जाऊंगी तब सारंगढ़ के राजा ने जेवरादाई माता की सर्त को मान लिया और सारंगढ़ के राजा देवी की मूर्ति को रात्रि में बैलगाड़ी से अपनी राज्य ले जा रहा था। तभी ठीक उसी रात भटगांव के जमींदार को मां जेवरादाई ने स्वपन्न दिया कि मुझे सारंगढ़ का राजा जबरदस्ती उठाकर बैलगाड़ी में अपने राज्य ले जा रहा है तब भटगांव जमींदार उसी रात क्षेत्र के कुछ ग्रामीणों को लेकर देवसागर पहुंचा। जहां सारंगढ़ के राजा माता हिंगलाज देवी की मूर्ति को अपने बैलगाड़ी में लेकर जा रहा था?। तो वहीं सारंगढ़ के राजा मां जेवरादाई की मूर्ति को लेकर थोड़ी दूर ग्राम देवसागर के कोसमनाल के पास पहुंच पाया था। तभी सारंगढ़ के राजा और भटगांव जमींदार के बीच जबरदस्त युद्ध चला साथ ही युध्द के चलते चलते सुबह हो गई तब मां जेवरादाई के कहे अनुसार सारंगढ़ के राजा को मां जेवरादाई की मूर्ति को वहीं ग्राम देवसागर में छोड़ कर जाना पड़ा और भटगांव जमींदार ने भी सारंगढ़ के राजा को मूर्ति को छोड़ कर जाने को कहा तब सारंगढ़ के राजा ने देवी की मूर्ति को ग्राम देवसागर के कोसमनार के पास छोडक़र अपने राज्य सारंगढ़ चला गया। वहीं पुराने बुजुर्गों ने बताया कि सारंगढ़ राजा एवं भटगांव जमींदार के बीच देवी मूर्ति को ले जाने के चलते काफी विवाद हुआ, इस दौरान सारंगढ़ के राजा ने देवी के नाक का कुछ हिस्सा नथनी सहित काट कर अपने राज्य सारंगढ़ ले गया। जहां आज भी चैत्र पूर्णिमा के दिन सारंगढ़ राज महल में देवी की नाक की पूजा अर्चना होती है?। ठीक इसी दिन चैत्र पूर्णिमा के दिन ग्राम देवसागर में भटगांव जमींदार स्व.धरम सिंह ने मूर्ति की स्थापना ग्राम पंचायत देवसागर की पहाडिय़ों के ऊपर की इसीलिए इसी दिन से चैत्रराई मेरे की शुरुआत हुई मेले का आयोजन प्रतिवर्ष चैत्र पूर्णिमा के दिन से आज तक भटगांव जमींदार परिवार द्वारा किया जाता है।



