धरमजयगढ़, ऋषभ तिवारी। छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद भी सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली और कथित अनियमितताओं में कोई कमी आती नहीं दिख रही है। ताजा मामला रायगढ़ जिले के छाल तहसील क्षेत्र का है, जहां राजस्व विभाग की संदिग्ध कार्यप्रणाली और विरोधाभासी आदेशों ने कानून व्यवस्था और न्यायालय की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मामला छाल तहसील के अंतर्गत ग्राम सिंगीझाप में स्थित करोड़ों (या लाखों) रुपये मूल्य की वाद भूमि खसरा नंबर 90/2/ज (रकबा 1.2140 हेक्टेयर) के नामांतरण (म्यूटेशन) से जुड़ा है। एक ही जमीन को लेकर तहसील न्यायालय द्वारा कुछ ही महीनों के भीतर दो बिल्कुल विपरीत आदेश पारित किए जाने का मामला सामने आने महकमे में हडक़ंप मच गया है।
मिली जानकारी के अनुसार, कुछ समय पूर्व छाल तहसील न्यायालय में उक्त भूमि के नामांतरण का आवेदन प्रस्तुत किया गया था। तब न्यायालय ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आवेदन को सिरे से खारिज कर दिया था। अपने आदेश में न्यायालय ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया था कि वाद भूमि खसरा नंबर 90/2/ज शासकीय आबंटन (पट्टा) से प्राप्त भूमि है। नियमानुसार, ऐसी भूमि के क्रय-विक्रय के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है। चूंकि इस मामले में कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई थी, इसलिए न्यायालय ने कानून सम्मत कदम उठाते हुए नामांतरण को नामंजूर कर दिया था।
कुछ महीनों बाद बिना अपील के ही बदल गया फैसला!
हैरानी की बात यह है कि इस खारिज आदेश के खिलाफ न तो किसी उच्च राजस्व न्यायालय में अपील की गई और न ही पूर्व के आदेश को किसी कानूनी प्रक्रिया के तहत अपास्त (निरस्त) कराया गया। इसके बावजूद, महज कुछ महीनों के भीतर छाल तहसील न्यायालय में उसी वाद भूमि का एक नया नामांतरण प्रकरण फिर से चलाया गया। इस बार न्यायालय ने नियमों को ताक पर रखते हुए क्रेता के पक्ष में नामांतरण आदेश जारी कर दिया। जिसके बाद वर्तमान में वाद भूमि में क्रेता हर्ष पटेल पिता टीका राम के नाम पर दर्ज कर दिया गया है।
न्यायालय को गुमराह करने की आशंका
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी विधिक त्रुटि और संदेहास्पद बात यह है कि बाद में जारी किए गए म्यूटेशन ऑर्डर में पूर्व के खारिज आदेश का कहीं कोई जिक्र नहीं किया गया है। जानकारों का कहना है कि तथ्यों को छुपाकर और न्यायालय को गुमराह करके इस विधि-विरुद्ध नामांतरण को अंजाम दिया गया है। बिना पूर्व अनुमति के शासकीय पट्टे की जमीन का म्यूटेशन होना राजस्व नियमों का खुला उल्लंघन माना जा रहा है।
क्या कहते हैं जानकार?
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार, जब तक किसी सक्षम न्यायालय का पूर्व आदेश प्रभावी है और उसे बदला नहीं गया है, तब तक उसी जमीन पर दोबारा नया म्यूटेशन केस चलाकर विपरीत आदेश जारी करना एक गंभीर कानूनी चूक है। इस मामले में राजस्व अधिकारियों की भूमिका और उनके कामकाज के तरीकों पर उंगलियां उठने लगी हैं। स्थानीय स्तर पर अब इस मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग तेज हो रही है।



