पखांजूर। सावन मास के पावन अवसर पर हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी क्षेत्र के सैकड़ों शिवभक्तों ने श्रद्धा और आस्था के साथ कांवड़ यात्रा निकाली। चितरंजन नगर (पी.व्ही.-91), छोटेबेटिया क्षेत्र के शिवभक्त धमतरी जिले के नगरी सिहावा स्थित महानदी के उद्गम स्थल पहुंचे। यहां से कांवड़ में पवित्र जल भरकर भक्तों ने करीब 80 से 90 किलोमीटर का सफर तय करते हुए केशकाल स्थित प्रसिद्ध शिवधाम गोबराहीन के प्राचीन शिव मंदिर तक यात्रा की।लंबी दूरी की इस धार्मिक यात्रा के दौरान शिवभक्त पूरे उत्साह और भक्ति के साथ आगे बढ़े। गोबराहीन पहुंचने के बाद श्रद्धालुओं ने प्राचीन शिवलिंग पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और महानदी के उद्गम स्थल से लाए गए पवित्र जल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया। इसके साथ ही दूध चढ़ाकर भगवान भोलेनाथ से क्षेत्र, परिवार और समाज की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की गई।
जानकारी अनुसार पी.व्ही.-91 चितरंजन नगर और छोटेबेटिया क्षेत्र के शिवभक्त लगातार पांच वर्षों से गढ़ धनोरा गोबराहीन के प्राचीन शिव मंदिर तक कांवड़ यात्रा कर रहे हैं। हर वर्ष सावन में श्रद्धालुओं की संख्या और उत्साह बढ़ता जा रहा है। कठिन और लंबी यात्रा के बावजूद भक्तों में भगवान शिव के प्रति आस्था और उत्साह देखने को मिला। गोरहीन स्थित प्राचीन शिवलिंग को लेकर श्रद्धालुओं के बीच विशेष धार्मिक मान्यता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु विशालकाय शिवलिंग को अपनी दोनों बांहों से पूरी तरह आलिंगन कर लेता है, उसकी मनोकामना पूर्ण होती है और उसे सौभाग्य की प्राप्ति होती है। इसी आस्था के चलते दूर-दूर से श्रद्धालु इस प्राचीन शिवधाम में दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।
धार्मिक आस्था के साथ-साथ गोरहीन क्षेत्र ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। जानकारी के अनुसार यहां के टीलों की खुदाई के दौरान 5वीं-6वीं शताब्दी के ऐतिहासिक अवशेष मिलने की बात सामने आई है। इससे इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास और धार्मिक महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है। वहीं महाशिवरात्रि के अवसर पर गोबराहीन में विशाल मेले का आयोजन भी होता है। इस दौरान आसपास के क्षेत्रों के साथ-साथ दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और भगवान शिव के दर्शन कर जलाभिषेक एवं पूजा-अर्चना करते हैं।सावन में निकली यह कांवड़ यात्रा केवल धार्मिक यात्रा नहीं,बल्कि श्रद्धालुओं की आस्था, परंपरा और भगवान भोलेनाथ के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक बन गई है।
पांच वर्षों से जारी है कांवड़ यात्रा की परंपरा, गोबराहीन तक पैदल पहुंचे शिवभक्त



