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Reading: नाम कमाओ, धन नहीं- यही जीवन की असली पूंजी है : पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम
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NavinKadam > रायगढ़ > नाम कमाओ, धन नहीं- यही जीवन की असली पूंजी है : पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम
रायगढ़

नाम कमाओ, धन नहीं- यही जीवन की असली पूंजी है : पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम

‘जीवन एक यात्रा है, इच्छाओं का बोझ मत बढ़ाओ’ : बाबा प्रियदर्शी राम का सत्संग संदेश- मोबाइल और नशे से बचो, शक्ति का सदुपयोग करो : युवाओं से बाबा प्रियदर्शी राम का आह्वान, प्रियदर्शी बाबा राम जी ने किया माता पिता गुरु के सम्मान का आह्वान, गुरु पूर्णिमा पर पूज्य पाद बाबा प्रियदर्शी राम का आशीर्वचन

lochan Gupta
Last updated: August 11, 2026 12:02 am
By lochan Gupta August 11, 2026
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18 Min Read

रायगढ़। गुरुपूर्णिमा के अवसर पर पूज्य बाबा प्रियदर्शी राम जी ने समाज के लोगों से माता पिता गुरुजनों का सम्मान करने का आह्वान करते हुए कहा तीनों का सम्मान मानव जीवन का मजबूत आधार है। मानव जीवन से जुड़े सभी आवश्यक पहलुओं पर उन्होंने विचार व्यक्त करते हुए धन कमाने वाले और नाम कमाने वाले के मध्य अंतर बताते हुए कहा दशकों पूर्व महान आत्मा पूज्य अघोरेश्वर के विचारों का चिंतन हम सभी कर रहे है लेकिन उस दौर में बहुत लोगों में धन कमाया होगा लेकिन आज किसी को याद नहीं है। नाम की कमाई को जीवन की असली कमाई बताया। संसार में संपर्क में आने के पहले गर्भस्थ शिशु संसार में आने लिए प्रार्थना करता है और जैसे ही संसार के संपर्क में आता है सब कुछ भूल बैठता है। जैसे वर्षा का पवित्र जल धरती के सम्पर्क में आते ही मटमैला हो जाता है। माया के चक्रव्यूह में फंसा हुआ मनुष्य अपने जीवन का वास्तविक उद्देश्य भूल बैठता है लेकिन गुरु जन मनुष्य को इस काकश घेरे से आसानी से बाहर निकाल देते है। संतो के बताए मार्ग का अनुशरण मनुष्य के लिए मोक्ष का मार्ग होता है। बाबा प्रियदर्शी राम जी ने समाज से आग्रह किया कि वे साधु सन्तों के सत्संग को अपने जीवन में उतारे। इसके लिए अनुशासित जीवन शैली की व्याख्या करते हुए कहा किसी भी समाजिक धार्मिक व्यापारिक संस्थान के बनाए गए नियमों का पालन करना ही अनुशासन है। स्वार्थी मानसिकता को जीवन के लिए घातक बताते हुए कहा दूसरों के सुख सुविधाओं के लिए जीवन जीने वाला व्यक्ति महान होता है। मनुष्य के नाम की पहचान को मिट्टी के घड़े के समान बताते हुए कहा जैसे मिट्टी के आकार का नाम ही घड़ा है और यह घड़ा टूटकर वापस मिट्टी में मिल जाता है घड़े का कोई स्थाई अस्तित्व नहीं है। मनुष्य का नश्वर शरीर भी मिट्टी के घड़े की भांति है। घड़े की पहचान मिट्टी से नहीं बल्कि उसके नाम से है उसी तरह मनुष्य की पहचान उसके नाम से है लेकिन उसमें मौजूद प्राण तत्व से मनुष्य की पहचान नहीं होती। जैसे ही यह शरीर नष्ट होता है उसका नाम भी सदा के लिए अग्नि वायु जल आकाश मिट्टी में विलीन हो जाता है। नाम की पहचान को क्षणभंगुर बताते हुए कहा हर मनुष्य के अंदर मौजूद अदृश्य प्राण शक्ति ही जीवन का सत्य है। शरीर का नाम रूप बदलता है बचपन से जवानी जवानी से बुढ़ापा फिर मृत्यु अर्थात शरीर का नष्ट होना यह सब शरीर के लिए है लेकिन इसके अन्दर मौजूद आत्मा या प्राण इन सभी बदलाव से बेअसर रहती है। हर जन्म में शरीर का नाम बदलता जाता है। देह को मिथ्या बताते हुए पूज्य पाद ने कहा मनुष्य मिथ्या को ही जीवन का सत्य मान कर जीवन जीता है।इस कटु सत्य से अनभिज्ञ होने की वजह से मनुष्य नाना प्रकार के दुखों से घिरा हुआ है। संतो का सान्निध्य ही हमे इस अज्ञानता के घेरे से बाहर निकाल सकते है। गुरु के बिना मनुष्य को जीवन के सत्य का बोध नहीं होता। बिना गुरु के मनुष्य चौराहे पर खड़े उस व्यक्ति के समान है जिसे अपनी मंजिल का पता नहीं और उसे जाना भी है। नाना प्रकार से उलझनों के फंसा हुआ मनुष्य जीवन के वास्तविक सुख से अनजान रहता है इसलिए वह केवल धन संग्रह में जुटा रहता है और धन को जीवन का असली सुख मान लेता है जबकि यही उसके दुखों का कारण है। धन केवल साधन है और आवश्यकता से अधिक धन का संग्रह जीवन में विलासिता वासना का कारण बन जाता है। इस वजह से दुखी मनुष्य आत्मिक शांति चाहता है। आत्मिक सुख के उपाय बताते हुए बाबा जी ने कहा इसके लिए अंतर्मुखी होकर अंदर की ओर यात्रा करनी पड़ती है। तभी संसार में रहते हुए सत्य को भी आसानी से समझा जा सकता है । सारी संपत्ति को भगवान की बताते हुए पूज्य पाद ने कहा मनुष्य इस संपत्ति का मालिक समझ मनमानी कर दुरुपयोग करने लगता है संसार की संपत्ति को सबकी संपति मानने की सलाह देते हुए कहा हर मनुष्य को खाने पीने रहने या वस्त्रों का आवश्यकता नुसार ही

उपयोग करना चाहिए।आवश्यकता से अधिक एकत्र करने की मानसिकता जीवन को वास्तविक लक्ष्य से दूर ले जाती है जैसे सफर में जाते समय बोझ से बचने के लिए बहुत जरूरी समान रखते है। बेवजह समान का बोझ यात्रा को कष्टकारी बना सकती है जीवन भी एक यात्रा की तरह है ।समान की सीमित मात्रा आपके जीवन सफर को सुखदाई बना सकती है। संसार में कुछ ऐसे लोग है जो पुनर्जन्म लोक परलोक पर विश्वास नहीं करने की बजाय जिंदगी में मिले सुखो को भोगने में विश्वास करते है वही ऐसे लोग भी होते है जो अच्छे सद्कर्म कर आने वाली जीवन यात्रा सुधार लेते है। अपने सुख के लिए जीवन जीने वाले व्यक्तियों के लिए गुरु ज्ञान को निरर्थक बताते हुए बाबा प्रियदर्शी राम ने शिष्यों से आह्वान करते हुए कहा जीवन में वास्तिक सूखों को जानने की जिज्ञासा पैदा करो जो कभी समाप्त नहीं होते। कभी समाप्त नहीं होने वाले सूखों के लिए त्याग तपस्या सत्संग ध्यान धारणा अनुशासित जीवन आवश्यक होता है ।इस सुख को पाने के लिए धन संपति की आवश्यकता नहीं है।अस्थिर मन को शांत करने के लिए संतो का सान्निध्य और बताए मार्ग का अनुशरण आवश्यक है । जीवन के वास्तविक उद्देश्य को जाने बिना जीवन के वास्तविक सुख दुख को आसानी से नहींसमझा जा सकता। मनुष्यों का जीवन विभिन्न आशाओं वासनाओ तृष्णाओं से भरा होता हैं। सांसारिक सुख मनुष्य को अपनी ओर खींचती है और ज्ञान के अभाव के बिना मनुष्य उस ओर खिंचा चला जाता है। जब तक जीवन के वास्तविक सुख को नहीं समझेंगे तब तक वास्तविक सुख की प्राप्ति नहीं होगी।सत्संग को जीवन का वास्तविक रंग बताते हुए कहा सत्संग के लिए संतों का सान्निध्य आवश्यक है। सत्संग की वजह से मनुष्य जीवन की वास्तविकताओं को समझ सकता है। धन संपति की एक निश्चित मात्रा को जीवन के लिए आवश्यक बताते हुए बाबा प्रियदर्शी ने आह्वान करते हुए कहा मनुष्य की अपनी आवश्यकताएं समिति करनी चाहिए ताकि किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत ना पड़े। जरूरत से अधिक आवश्यकताएं ही मनुष्य को जीवन में गलत मार्ग में ले जाने का कारण बनती हैं।अपनी इच्छाओं को समिति करके जो कुछ हासिल है उससे आसानी से जीवन जिया जा सकता है असीमित इच्छाएं मनुष्य को जीवन में भोगी विलासी बनाती है। मनुष्य और संतो के जीवन का फर्क समझाते हुए कहा मनुष्य कुछ ना कुछ पाने के लिए कर्म करता है जबकि संत कुछ पाने की इच्छा से कर्म नहीं करता । इसलिए मनुष्य का कर्म बंधन कारी है।राष्ट्र सेवा के लिए किए जाने वाला कर्म बंधन कारी नहीं होता। संत समाज के उत्थान के लिए कर्म करता है वही मनुष्य अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए कर्म करता है जबकि संत सोये हुए मानव समाज को जगाने के लिए काम करता है। सोए हुए व्यक्ति को जगाना सरल है लेकिन काछे को जगाना कठिन है। संसार में दोनों तरह के लोग मौजूद है जो जागना चाहता है या अपना कल्याण करना चाहता है उसे ध्यान धारणा और नाम का जाप करना होगा। गुरु वचनों को अपने जीवन में आत्मसात करना पड़ेगा। धन संचय के पीछे भागने वाला मनुष्य अपनी ख्याति से भी हाथ धो बैठता है। नाम की ख्याति पाने के लिए धन संचय की प्रवृत्ति का त्याग करना पड़ेगा और जो व्यक्ति धन की बजाय धर्म के लिए काम करता है अर्थ उसके पीछे अपने आप आ जाता है।मृत्यु के साथ धन संपदा सब कुछ पीछे छूट जाता हैं लेकिन नाम की कमाई अर्थात ख्याति उसे मरने के बाद भी जीवित रखती है। दशकों पूर्व अघोरेश्वर महाप्रभु ने जन हित के लिए जो कार्य किए वो आज भी प्रासंगिक है।0 जबकि उस दौर के गिने चुने धनाढ्य लोगों को हम नहीं जानते। यही नाम की असली कमाई है। जो कुछ हम अच्छा बुरा कार्य करते है वो मृत्यु के बाद अगले जीवन सफर के लिए मनुष्य का प्रारब्ध बन जाता है जिसे हम भाग्य कहते है। अच्छे कर्म से संचित प्रारब्ध ना केवल इस जन्म में बल्कि अगले जन्म में भी वह काम आता है और मनुष्य अच्छे कर्म के जरिए संचित प्रारब्ध से समाज को कुछ दे भी सकता है । समाज में बहुत से बुजुर्ग दिन भर राम नाम का सुमिरण अथवा राम नाम का जाप करने की बजाय बेवजह घर परिवार की चिंता में डूबे रहते है इस चिंता के जरिए वे खुद के स्वास्थ्य को नष्ट कर लेते है और परिवार जनों को भी कुछ नहीं दे पाते। इसलिए ऐसे कर्म कीजिए कि आपके साथ साथ परिवार जनों का भी कल्याण हो सके।तीन चीजें ईश्वर की भक्ति गंगा जी, सन्तो के वचन से मनुष्य अपने जीवन के कष्टों को दूर कर सकता है। इन तीन बातों के अनुकरण से ना केवल पापों का क्षय होगा बल्कि जागृति भी आएगी। ईश्वर ने मनुष्यों को विशेष सामर्थ्य प्रदान किया हैं। युवाओं से आह्वान करते हुए बाबा प्रियदर्शी राम ने कहा युवा अपने सामर्थ्य शक्ति का सदुपयोग कर महानतम स्थिति को हासिल कर परिवार समाज राष्ट्र का कल्याण कर सकते है। नशे के कुचक्र में फंसे युवा मोबाइल का अधिक प्रयोग कर ऐसे सूचनाओं का अनुकरण करने लगते है जो देश हित में नहीं है। संत समाज को इन बुराइयों को त्यागने का आह्वान करता है लेकिन केवल सन्त ही नहीं बल्कि माता पिता अभिभावकों की भी जवाबदेही है कि वे बच्चों को नशे को प्रवृतियों से दूर रखे और अत्यधिक मोबाईल ले उपयोग से बच्चों को बचाए। बच्चों की संगति पर भी नजर बनाए रखना आवश्यक है। बुरे व्यक्ति का संग या देश विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों का साथ बच्चों का भविष्य बर्बाद कर सकता है। बच्चों का भविष्य संवारने की जवाबदारी माता पिता की है। इस जवाबदारी से मुंह नहीं मोडऩा चाहिए । जीवन के कल्याण के लिए समाज को दिए संदेश में कहा मनुष्य को सदैव ईर्ष्या द्वेष लोभ मोह स्वार्थ चुगली से बच कर रहना है। किसी भी मनुष्य का अपमान उस आत्मा का अपमान है इसलिए कभी किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। मनुष्य के अपमान को पूज्य बाबा जी ने ईश्वर का ही अपमान बताया।तुलसी दास के दोहे का उदाहरण देते हुए समझाया कि सभी को एक समान मानना चाहिए लेकिन गलत मार्ग में चलने वाले गलत कार्य करने वाले से सजग रहने की आवश्यता भी जताई। परम सत्य, परम आनंद ,की राह में चलने के लिए ऐसे लोगों का साथ भी होना आश्यक है। संतो की सलाह को सही तरीके से समझने और उसे जीवन में उतारने की आवश्यकता बताते हुए पूज्य बाबा जी ने महिलाओं को सोच का दायरा व्यापक करने की बात कही। परिवार में हो रही टूट के प्रति चिंता जाहिर करते हुए कहा लोग आज कल बेटियों की शादी के लिए छोटे परिवार का चयन करने लगे है । तकि बेटियों पर काम का अधिक दबाव ना पड़े । अलग रहने की वजह से परिवारों में एका का अभाव हो रहा पारस्परिक सहयोग की भावना घट रही है। कर्म विधान के संबंध में उन्होंने कहा जैसा आप बोते है उसका फल भी आपको ही काटना है इसलिए जो आप दे रहे है वही आपके पास लौट कर भी आयेगा यदि आप किसी के साथ अच्छा व्यव्हार अच्छा आचरण करते है तो यह आपके पास लौट कर आएगा।इसलिए मनुष्य को सोच समझ कर आचरण करना चाहिए। जैसे किसी फुटबॉल को मारने पर वह टकराकर आपके पास वापस लौटता है इसी तरह कर्म भी वापस लौट कर आते है। टालने की प्रवृति को घातक बताते हुए पूज्य बाबा जी ने कहा तपस्या का उद्देश्य भी सही होना चाहिए क्योंकि असुरों ने भी तपस्या की थी लेकिन उनका उद्देश्य गलत था इसलिए वे शक्ति शाली होकर भी नष्ट होते चले गए। इसलिए तपस्या का उद्देश्य सार्थक होना चाहिए। ध्यान धारणा का निरंतर अभ्यास भी जीवन के लिए अवश्यक बताया। जीवन में त्याग से सुख मिलता है। सोना खरीदने से सुख नहीं मिलता बल्कि इसे खरीदने के लिए धन को त्यागने से सुख मिलता है।जीवन में आवश्यकता को कम करने की सलाह देते हुए उन्होंने कहा मनुष्य को जीवन में निरंतर ईश्वर का सुमिरन करते हुए सद्कर्मों के प्रति अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इससे उसके जीवन में आने वाले कष्ट भी टल सकते है। मानव जीवन की अनमोल बताते हुए कहा यह मानव जीवन व्यर्थ में नहीं गंवाना चाहिए। किसी के साथ बैर भाव ईष्या द्वेष नहीं रखना चाहिए सभी के साथ समान व्यवहार रखना चाहिए। दिन दुखियों के प्रति संवेदना मदद का भाव भी होना चाहिए। साधु संतो के बताए मार्ग का अनुशरण जीवन में सुख प्राप्ति का माध्यम है। जो व्यक्ति संतो के बताए मार्ग का अनुशरण करता है उनके जीवन में भटकाव नहीं होता।परिवार जनों के साथ रामायण महाभारत गीता का प्रतिदिन श्रवण करना चाहिए ताकि बच्चों को इन धर्म शास्त्र का समय रहते बोध हो। रामायण में बहुत से प्रसंग ऐसे है जो जीवन में काम आते है पिता के वचनों के पालन के लिए राज पाठ का त्याग वही बड़े भाई के लिए छोटे भाई द्वारा सिंहासन का त्याग पत्नी द्वारा पति का साथ देने के लिए वन गमन ये सारे प्रसंग मानव जीवन के लिए प्रेरक है।

 

बाबा प्रियदर्शी राम जी के 5 जीवन सूत्र

आशीर्वचन के दौरान जीवन के पांच सूत्र बताए। पहला माता-पिता-गुरु का सम्मान यही मानव जीवन की मजबूत नींव है दूसरा नाम कमाओ, धन नहीं क्योंकि धन पीछे छूट जाएगा, नाम मृत्यु के बाद भी आपको जीवित रखेगा । तीसरा आवश्यकताएं सीमित रखो क्योंकि अधिक इच्छा और मोह ही दुख का कारण है, जीवन एक यात्रा है बोझ मत बढ़ाओ । चौथा जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा। कर्म का फल फुटबॉल की तरह लौटकर आता है, सोच-समझकर आचरण करो। पांचवा सत्संग के साथ ध्यान और ईश्वर का सुमिरन क्योंकि यही आत्मिक शांति और मोक्ष का मार्ग है, बिना गुरु जीवन अंधकार है। बाबा जी के इन सूत्रों को जीवन में अपनाकर मनुष्य जीवन का कल्याण कर सकता है।

 

बहुएं सास को मां माने और सास बहुओं को बेटी : प्रियदर्शी राम

बहुएं सास को मां माने और सास बहुओं को बेटी केवल इस सूत्र के अनुकरण मात्र से घर में सुख शांति आयेगी परिवार में खुशी का माहौल होगा। संयुक्त परिवार की ताकत बताते हुए पूज्य पाद ने कहा सास मां बनकर बहुओं को मार्गदर्शन दे और बहुये बेटी बनकर सेवा करे तो घर ही तीर्थ बन सकता है। सुखी परिवार के लिए बाबा ने यह मंत्र दिया।

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