सारंगढ़। क्या सारंगढ़ प्रशासन जिला मुख्यालय की जनता के फेफड़ों और उनके आशियानों को चंद रुपयों के राजस्व के लिए दांव पर लगाने की तैयारी कर चुका है ? यह सुलगता हुआ सवाल आज सारंगढ़ की गलियों से लेकर कलेक्टर कार्यालय की चौखट तक गूँज रहा है। नगर पालिका के वार्ड क्रमांक 1, 2 और 10 सहित आधा दर्जन से अधिक गांवों के बीचों-बीच चूना पत्थर खदान की ई- नीलामी का प्रस्ताव लाना किसी ‘विनाशकारी प्रयोग से कम नहीं लग रहा है। स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने इसे सीधे तौर पर कानून की हत्या करार देते हुए कलेक्टर को चेतावनी भरा ज्ञापन सौंपा है। ?हैरानी की बात यह है कि – जिस जगह बारूद फोडऩे और धूल उड़ाने की तैयारी है, वह कोई निर्जन इलाका नहीं बल्कि शहर का हृदय स्थल है, जहाँ जिला अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, न्यायालय और एसपी ऑफिस जैसे संवेदनशील संस्थान स्थित हैं। ग्रामीणों ने तीखे लहजे में पूछा है कि क्या भारी ब्लास्टिंग और जहरीली धूल के बीच मरीजों का इलाज और बच्चों की पढ़ाई मुमकिन होगी? यह प्रस्ताव न केवल मानवीय संवेदनाओं के खिलाफ है, बल्कि सीधे तौर पर ‘मास्टर प्लान’ की धज्जियाँ उड़ाता है। कानून सम्मत रूप से जो क्षेत्र ‘आवासीय’ घोषित है, वहाँ खनन की अनुमति देना प्रशासनिक तानाशाही और भू-उपयोग नियमों का खुला उल्लंघन है।
?ग्रामीणों का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में लोकतंत्र को हाशिए पर रख दिया गया है। बिना किसी अनिवार्य जनसुनवाई और स्थानीय सहमति के चोरी छिपे नीलामी की ओर बढऩा यह दर्शाता है कि आम आदमी की जान की कीमत सरकारी खजाने से कम आंकी जा रही है। भारत माला परियोजना जैसी महत्वपूर्ण सडक़ योजना को भी इस खनन प्रस्ताव से खतरा पैदा हो गया है। सैकड़ों नागरिकों के हस्ताक्षरों के साथ सौंपे गए इस ज्ञापन ने प्रशासन को स्पष्ट अल्टीमेटम दे दिया है हम अपनी सांसें नहीं बेचेंगे यदि जनहित और सुरक्षा को दरकिनार कर इस आत्मघाती प्रस्ताव को निरस्त नहीं किया गया, तो सारंगढ़ की सडक़ों पर आक्रोश का ऐसा सैलाब उठेगा जिसे थामना प्रशासन के बस की बात नहीं होगी। अब देखना यह है कि हुकूमत जनता की चीख सुनती है या माइनिंग के शोर में उसे दबा देती है।
रिहायशी इलाकों के पास चूना पत्थर खदान के प्रस्ताव पर भारी विरोध, सौंपा ज्ञापन



