सारंगढ़। अगर आप यह समझते हैं कि पंचायतें सिर्फ गांव का विकास करने के लिए होती हैं, तो शायद आप खोखसीपाली के आधुनिक पंचायती राज से परिचित नहीं हैं। यहाँ विकास की गंगा नहीं, बल्कि हजारिया वसूल’ की सुनामी चल रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि यहाँ प्रधानमंत्री आवास योजना की चाबी तिजोरी से नहीं, बल्कि एक हजार के नोट और ‘दारू-मुर्गा’ के जायके से होकर गुजरती है।
मुर्गा संस्कृति विकास का गणित
कहते हैं कि पेट की राह दिल से होकर जाती है, लेकिन खोखसीपाली में आरोप है कि साहबों के पेट की राह गरीबों की जेब से होकर जाती है। ग्रामीणों ने दावा किया है कि सरपंच एंड कंपनी का डंका ऐसा बजता है कि मानों कानून उनकी जेब में, अधिकारी उनके मुर्गा – मेनू में हों। सरपंच महोदय का कथित दावा है हमें कोई छू नहीं सकता, क्योंकि हम सिस्टम को दावत देते हैं।अब सवाल यह है कि क्या वाकई प्रशासन का ईमान इतना सस्ता है कि एक प्लेट चिकन और जाम पर बिक जाए?
साहब का ‘निर्दोष’ राग
इतने संगीन आरोपों के बाद जब सरपंच पवन साहू से पूछा गया, तो उन्होंने बड़े ही मासूमियत भरे लहजे में आरोपों को ‘राजनीति’ बताकर पल्ला झाड़ लिया। वैसे भी, हमारे देश में कोई भी नेता यह नहीं कहता कि हाँ, मैंने मुर्गा खिलाया है वह तो बस यह कहता है कि सब झूठ है!
स्कीम का नाम हजार दो,वरना लिस्ट से आउट
प्रधानमंत्री आवास योजना का एक नया व क्रांतिकारी नियम खोखसीपाली में लागू हुआ (ग्रामीणों के अनुसार)। नियम सरल है -1,000 रु. दो और घर पाओ। नहीं दोगे ? तो फिर राशन कार्ड और पेंशन की भी खैर नहीं। गांव वालों का आरोप है कि करीब 3 लाख रुपये की ‘छोटा-मोटा चंदा वसूली डरा धमका कर वसूल ली गई। 6 महीने हो गए, न पैसा वापस मिला और न ही आवास की ईंट दिखी। ग्रामीण अब इसे प्रधानमंत्री आवास नहीं, बल्कि प्रधान जी का आवास’ फंड कह रहे हैं।
स्ट्रीट लाइट का अंधेरा व 15 वें वित्त का उजाला
15वें वित्त की राशि का उपयोग यहाँ ऐसी कलाकारी से किया गया है कि कागजों में गांव न्यूयॉर्क की तरह चमक रहा है, लेकिन जमीन पर ग्रामीणों को टॉर्च लेकर स्ट्रीट लाइट ढूंढनी पड़ रही है। आरोप है कि पानीां टंकी और लाइट के नाम पर 2 लाख रुपये की राशि का ऐसा जादू हुआ की वह सीधे तिजोरियों में जाकर ही रुकी। सचिव सरपंच की यह जुगलबंदी संगीत की दुनिया में भले ही न हो, लेकिन भ्रष्टाचार की महफिल में जरूर सुर्खियां बटोर रही है।
क्या ‘मेनू कार्ड बदलेगा’
ग्रामीण अब कलेक्टर साहब की चौखट पर हैं। उनकी मांग है कि धारा 40 का डंडा चले और इन ‘महासयों’ की वसूली वाली दुकान बंद हो। देखना दिलचस्प होगा कि प्रशासन इन आरोपों की निष्पक्ष जांच करता है या फिर ‘मुर्गा-मुलाहिजा’ वाली यह रवायत यूँ ही चलती रहेगी। खोखसीपाली के ग्रामीण पूछ रहे हैं साहब, हमारा घर कब बनेगा ? या फिर अगली किश्त के लिए बकरे का इंतजाम करना होगा?
खोखसीपाली पंचायत मे मुर्गा खाकर आवास बांटने का आरोप



